“मम्मी की दोस्त के साथ वो रात — एक अनकही चाहत”
शहर की गर्मी के मौसम में भी उस शाम हवा में एक अलग सी ठंडक थी। कहीं पेड़ों की पत्तियों पर बारिश के बूंदों का अवशेष था और रौशनी गलियों में धीरे-धीरे ढल रही थी। मोहित अपने कॉलेज के काम से थका हुआ घर लौटा — दिमाग में कुछ अधूरे ख्याल और हाथ में लेबररीरी की किताबें। उसकी माँ पहले से ही बाजार गई हुई थीं, और घर में आज किसी अतिथि का आना था — मम्मी की पुरानी दोस्त, सुनीता आंटी, जो शहर में कुछ दिनों के लिए रुकी हुई थीं।
सुनीता आंटी को मोहित काफी समय से जानता था — बचपन में उन्होंने उसे चॉकलेट दिलाई थी, स्कूल की किताबें संभालने में मदद की थी, और कभी-कभी पवार के समारोहों में कुछ सलाह भी दे देती थीं। पर आज वह कुछ अलग लग रही थीं — साधारण पर परिपक्व, मुस्कान में एक अलग तरह की शांति और आँखों में अनुभव की एक हल्की चमक। नया हेयरकट, सादी मगर आकर्षक साड़ी और हल्की खुशबू — सब कुछ किसी ख़ास अहसास की तरफ इशारा कर रहा था।
रात के आठ बजते-बसते माँ आईं और लिविंग रूम में सबको चाय की प्याली थमाई। बातों में हँसी, पुराने किस्से और बचपन की यादें उछल रही थीं। मोहित कुछ अजीब-सा हल्का लगा — जैसे कुछ नया मौसम उसके अंदर आ गया हो। सुनीता आंटी ने मोहित की तरफ देखा और कहा, “तुम्हारा कॉलेज कैसा चल रहा है? अब तुम्हारी जिंदगी में भी थोड़ी देर की शांति चाहिए।” उनकी आवाज़ में एक कोमलपन था जो मोहित के दिल को छू गया।
घर के बाकी लोग थोड़ी देर बाद सोने चले गए। माँ ने मेहमानों का ख्याल रखा और फिर घर शांत हो गया। पर सुनीता आंटी लॉबी में नहीं गयीं — उन्होंने कहा कि वो थोड़ी देर टहलेंगी। मोहित ने बताया कि उसकी पढ़ाई की किताबें टेबल पर ही हैं और फिर ऊपर कमरे में चले गए। पर कुछ मिनटों में उसे लगा कि शायद कुछ कहना बाकी रह गया है; उसने टीवी बंद कर दिया और धीरे-धीरे नीचे आ गया — पर वह देख कर चौंक गया कि आंटी बगीचे के पास दीवार के पास खड़ी हँस रही थीं, चाँदनी से उनका चेहरा और भी नर्म दिख रहा था।
“तुम भी जाग रहे हो?” आंटी ने मुस्कुराकर पूछा। उनकी आवाज़ में कोई शरम नहीं थी, सिर्फ़ दोस्ताना अपनापन। मोहित ने हाथ मिलाया और कहा, “हाँ आंटी, कुछ पढ़ाई के काम थे, फिर सोचा थोड़ी हवा लग जाए।” वे दोनों बाग में टहलने लगे — हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू और दूर से किसी सड़क की धीमी गूँज।
तभी आसमान में बादल जमीं और एक हल्की बूँद उनके सिर पर गिरी। आंटी ने अपनी साड़ी की कंचुओं से धीरे-से पिन हटाया और मोहित के कंधे पर वह कंबल डाल दिया जो पिछले सेशन में वापसी में उनकी कार की पिछली सीट पर पड़ा था। मोहित का दिल एक अजीब-सा हल्का-सा कूद गया। यह व्यवहार बिलकुल मां-बेटे जैसा नहीं था; यह किसी अजनबी में मिलने वाली कोमलता और परिपक्व स्नेह की तरह था — एक तरह का सुकून जो अचानक मिल जाए।
बड़ों की बातचीत अक्सर अनुभव से भरी होती है — आंटी ने धीरे कहा, “तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि हम बड़े होने पर भी अंदर ही अंदर बच्चे रह जाते हैं? कभी-कभी मुझे भी जिंदगी बहुत खाली लगती है।” उसकी आवाज़ में एक छिपी हुई उदासी थी। मोहित कुछ बोल नहीं पाया। वह जानता था कि आंटी शादीशुदा हैं, उनकी अपनी जिंदगी है — पर उनकी आवाज़ में एक नर्माहट थी जो किसी की समझ चाहती थी।
थोड़ी देर बाद मॉनसून की तेज़ बारिश पानी की धार की तरह ज़मीन पर आ पड़ी। आंटी ने कहा— “चलो अंदर चलते हैं, ये बारिश जल्दी थम जाएगी।” पर उनके कदम धीमे थे, और भीतर बैठकर भी कुछ अनकहा सा बनता गया। दोनों ने चाय बनाई — हल्की-सी, मीठी। खाना खाते-खाते बसी हुई चुप्पी धीरे-धीरे बातचीत में बदल गई। वे दोनों अतीत की कहानियाँ साझा कर रहे थे — काम, जिम्मेदारियाँ, और कभी-कभी अकेलेपन की भावनाएँ।
बारिश के बीच की घड़ी कुछ धीमी और विशेष होती है। बच्चे की तरह मोहित ने कुछ हँसी मज़ाक किए — और आंटी ने उसकी आँखों में खुशी देखी। अचानक, बिना किसी लाइन के, आंटी ने कहा — “कभी-कभी मुझे किसी साथी की बहुत ज़रूरत लगती है, कोई जिसके साथ खुद होने की हिम्मत हो।” उनके शब्दों में कोई उथल-पुथल नहीं थी, सिर्फ़ मानवीय सच।
मोहित ने देखा कि उसकी साँसें कुछ तेज़ हो गई हैं। वह पहचान गया कि यह भावनाएँ अब सिर्फ़ माँ-बेटा सम्बन्ध की तरह नहीं थीं — वे दोनों वयस्क थे, अनुभव और समझ से परिपक्व। मोहित ने धीरे से कहा — “आंटी, अगर आप चाहें तो मैं सुनने के लिए हमेशा मौजूद हूँ।” उसके शब्दों में सज्जनता थी — सीमाओं का सम्मान और परिपक्व स्नेह। आंटी की आँखें नम हो गईं। वे दोनों चुप हो गए, पर यह चुप्पी किसी शर्म से नहीं थी — बल्कि एक समझ से भरी थी।
बाद में, जब रात और गहरी हुई, आंटी ने धीमी आवाज़ में पूछा — “क्या तुम मेरे साथ थोड़ी देर और बैठोगे?” मोहित ने बिना किसी हिचक के कहा — “हाँ।” वे घर की बालकनी में वापस आ गए और चाँदनी के नीचे दोनों ने हाथों में चाय पकड़ी। आंटी ने अचानक कहा — “कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि जिंदगी ने हमसे कुछ छीन लिया है, पर किसी अजनबी की मुस्कान भी बहुत कुछ दे सकती है।” उनकी बात में सच्चाई थी और मोहित समझ गया कि यह पल सिर्फ़ एक रात का नहीं रहना चाहिए — पर वह तुरंत सोच में पड़ गया कि सीमाएँ क्या होंगी, किस तरह ये रिश्ता सम्मान से बना रहेगा।
धीरे-धीरे वह पल गले लगाकर आ गया — आंटी ने मोहित का हाथ पकड़ा, पर यह पकड़ माथापच्ची नहीं थी; यह बचपन की सुरक्षा और वयस्क चाहत का एक मिश्रण था। उनका एक-दूसरे के पास स्नेह का रूप अलग था — इधर आंटी को किसी के साथ होने की चाह थी और उधर मोहित ने एक कोमल साथी पाया — कोई जो उसकी बात सुने, उसकी चिंता जाने, और उसे बिना किसी नाप तक सीमित करे। वे दोनों समझते थे कि जो भी हो रहा है, उसे एक नाजुक सम्मान के साथ जीना होगा। कोई जल्दीबाज़ी नहीं, कोई दबाव नहीं — सिर्फ़ परस्पर सहमति और आत्मीयता।
अगले कुछ घंटों में दोनों ने अपनी भावनाओं को शब्दों में नहीं बांधा; उन्होंने आँखों और स्पर्श से एक दूसरे को समझा। आंटी ने कहा — “यदि तुम चाहोगे, हम धीरे-धीरे इस रिश्ते को समझेंगे। किसी से कुछ छुपाने की ज़रूरत नहीं, बस—सम्मान और समझ।” मोहित ने सिर हिलाकर सहमति दी। उसने महसूस किया कि यह प्रेम कोई जुनून नहीं था; यह एक परिपक्व चाहत थी, दोनों के लिए एक स्नेहपूर्ण सहारा — जो किसी भी रूप में सम्मान तोड़ने का कारण न बने।
सुबह होने पर सब कुछ सामान्य दिखा — माँ की हँसी, नाश्ते की चाय और परिवार की हल्की-सी हलचल। पर दोनों के अंदर जो पल थे, वे नई उम्मीद दे गए थे। आंटी ने मोहित को हाथ पर हल्का सा चुंबन दिया — यह किसी पारिवारिक सीमा का उल्लंघन नहीं था, बल्कि भरोसे और नए आरम्भ का संकेत था। मोहित ने महसूस किया कि अब उनकी ज़िंदगी में एक नई कड़ी जुड़ चुकी है — पर यह कड़ी इज्जत और समझ से बनी होगी। दोनों ने तय किया कि वे धीरे-धीरे इस रिश्ते को आगे बढ़ाएँगे — बिना किसी दबाव के, बिना किसी शर्म के, बस परस्पर सहमति, सम्मान और प्यार के साथ।
(डिस्क्लेमर: यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। सभी पात्र 21+ उम्र के हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति से कोई संबंध नहीं।)