भाग 1 — घर का सन्नाटा और भाभी की आवाज़
अर्पित 24 साल का था, MCA की पढ़ाई कर रहा था।
भाई शादी करके शहर में रहने लगे थे और घर पर सिर्फ़ देवर–भाभी थे।
भाभी नैना, 28 साल की।
सादी-सी, मुस्कुराने वाली और बेहद शांत स्वभाव की।
अर्पित अक्सर पढ़ाई में खोया रहता, लेकिन हर सुबह भाभी के हाथ की चाय पीकर ही उसका दिन शुरू होता।
एक दिन सुबह भाभी ने पूछा—
“अर्पित, आज कॉलेज नहीं जाना?”
अर्पित ने कहा—
“नहीं भाभी… थोड़ा मन भारी है।”
भाभी ने उसकी आंखों में देखकर कहा—
“सब ठीक है ना? तुम थके हुए लग रहे हो।”
अर्पित ने चुप रहकर हाँ में सिर हिलाया, लेकिन नैना भाभी समझ गईं कि कुछ तो चल रहा है।
भाग 2 — पहली बार खोला दिल
शाम के समय बारिश हो रही थी।
घर के अंदर हल्का अंधेरा था और नैना भाभी रसोई में खाना बना रही थीं।
अर्पित उनके पास आया और धीरे से बोला—
“भाभी… बात करूँ?”
नैना ने स्टोव बंद किया—
“हां अर्पित, बैठो… क्या हुआ है?”
अर्पित ने कुछ सेकंड चुप रहकर कहा—
“कॉलेज में कुछ लोग मज़ाक उड़ाते हैं कि मैं अकेला रहता हूँ… मेरे पास कोई नहीं…”
भाभी ने उसके कंधे पर हाथ रखा—
“अकेला? मैं क्या हूँ फिर?”
अर्पित ने पहली बार उनकी तरफ़ गहराई से देखा।
उनकी आँखें बेहद भरोसेमंद थीं।
नैना बोली—
“ये घर तुम्हारा है… और मैं भी।”
यह वाक्य अर्पित के दिल में कहीं गहराई तक उतर गया।
भाग 3 — रात की चाय और नज़दीकियाँ
रात में जब दोनों छत पर पहुंचे, बारिश रुक चुकी थी।
भाभी ने दो कप चाय रखे और बोली—
“कभी-कभी लोगों की बातें दिल को चोट पहुँचाती हैं… लेकिन तुम उनसे ऊपर हो।”
अर्पित ने कहा—
“भाभी, आप होती हो न… तो सब ठीक लगता है।”
भाभी धीमे से मुस्कुराईं—
“तुम बहुत अच्छे हो अर्पित… बस खुद को कम मत समझो।”
उनकी आवाज़ इतनी कोमल थी कि अर्पित का दिल पहली बार तेज़ धड़कने लगा।
बारिश की गीली हवा, हल्की ठंड और भाभी की नज़दीकी…
सब कुछ बदल रहा था।
अचानक भाभी का दुपट्टा हवा में उड़कर अर्पित के चेहरे से टकराया।
अर्पित ने उसे पकड़कर कहा—
“संभाल कर भाभी…”
नैना ने हंसते हुए कहा—
“हवा ज्यादा शरारत कर रही है।”
उनकी हंसी और पास बैठने से अर्पित को महसूस हुआ कि उनके बीच कुछ अलग-सा एहसास है…
जो दोनों बोल नहीं पा रहे थे।
भाग 4 — भाभी का अकेलापन, देवर की समझ
भाभी अचानक चुप हो गईं।
अर्पित ने पूछा—
“क्या सोच रही हो?”
नैना की आँखें नम हो गईं—
“कई बार लगता है… कि मैं भी अकेली पड़ गई हूँ।”
अर्पित चौंका—
“क्यों भाभी? भाई तो हैं ना?”
भाभी ने गहरी सांस ली—
“हाँ हैं… पर अब हमारा रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा। जिंदगी बदल गई है… कभी-कभी बहुत अकेलापन लगता है।”
अर्पित धीरे से बोला—
“आप अकेली नहीं हो… मैं हूँ न।”
नैना ने उसकी ओर देखा—
उनकी आँखों में भरोसे और चाहत का मिश्रण था।
दोनों कुछ देर यूँ ही खामोश बैठे रहे।
खामोशी में भी एक मीठा एहसास था।
भाग 5 — एक गलतफ़हमी वाला स्पर्श, जिसने सब बदल दिया
अचानक हल्की फिसलन के चलते भाभी का पाँव फिसला और वो अर्पित के ऊपर गिर पड़ीं।
उनके बाल अर्पित के चेहरे पर थे…
उनकी साँसे उसके गाल को छू रहीं थीं…
अर्पित का दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि दोनों सुन पा रहे थे।
भाभी ने धीरे से खुद को संभाला—
“सॉरी… मैं फिसल गई…”
अर्पित ने धीरे से कहा—
“भाभी… मैं हूँ न… गिरने नहीं दूंगा।”
नैना की आँखें उस पल कुछ और ही कह रही थीं।
अर्पित ने उनका हाथ पकड़ा…
भाभी ने छोड़ा नहीं।
दोनों की उंगलियाँ आपस में बंध गईं।
भाग 6 — दिल की बात आखिर कह दी गई
नैना ने धीमे से कहा—
“अर्पित… क्या तुम्हें कभी लगता है कि… हम दोनों…”
वो वाक्य पूरा नहीं कर पाईं।
अर्पित ने धीरे से कहा—
“हाँ भाभी… मुझे लगता है।”
नैना ने उसकी तरफ देखा—
उनकी आँखें चमक रही थीं, होंठ काँप रहे थे।
“ये गलत तो नहीं है?”
भाभी ने पूछा।
अर्पित ने शांत आवाज़ में कहा—
“गलत तब होता जब ये मजबूरी होती…
पर हम दोनों इसे महसूस कर रहे हैं…
इसमें गलत कुछ भी नहीं…”
भाभी की हथेलियाँ अर्पित की हथेलियों को कसकर पकड़ चुकी थीं।
उनकी नज़रों में डर नहीं था—
बस चाहत थी… और भरोसा।
भाग 7 — दिलों का मिलन
दोनों छत की रेलिंग के पास खड़े थे।
हल्की हवा, रात की नमी और पास खड़े दो दिल…
भाभी ने पहली बार अर्पित के कंधे पर सिर रखा।
अर्पित ने उनके सिर पर हाथ रखा।
भाभी ने उसकी कमर पकड़ ली…
दोनों की सांसें एक हो गईं।
अर्पित ने धीरे से कहा—
“मैं आपको कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
नैना ने आँखें बंद करते हुए कहा—
“मुझे बस इतना ही चाहिए था… कोई जो मुझे समझे।”
सांसें एक-दूसरे को छू रही थीं…
दूरी खत्म थी…
और दिल मिल चुके थे।
भाग 8 — नई सुबह, नया रिश्ता
अगली सुबह भाभी ने चाय बनाई।
अर्पित आया तो उसने पहली बार बिना झिझक मुस्कुराकर कहा—
“Good morning… अर्पित।”
अर्पित ने कहा—
“आज आप बहुत खुश लग रही हैं।”
भाभी बोलीं—
“कभी-कभी… जिंदगी में एक इंसान ही काफी होता है… जो हमें पूरा कर दे।”
अर्पित ने उनकी ओर देखा—
वही पुराना एहसास, बस अब ज़्यादा साफ़।
दोनों समझ चुके थे—
उनका रिश्ता किसी नाम का मोहताज नहीं है…
बस दिलों का भरोसा और चाहत ही काफी है।
(Disclaimer: कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। सभी पात्र 21+ उम्र के हैं। कहानी में कोई explicit sexual detail नहीं है।)