भाग 1 — शाम की बारिश और भाभी की हंसी
शाम के लगभग पाँच बज रहे थे।
आसमान में घने बादल जमा हो गए थे और हवा में वह नमी थी जो बारिश से ठीक पहले होती है।
रोहन, 24 साल का, कॉलेज से घर लौटा ही था।
जैसे ही उसने बैग रखा, बाहर से आवाज़ आई—
आवाज़ भाभी অন्वी की थी।
“रोहन, बरामदे में आओ ज़रा!”
रोहन बाहर आया तो दृश्य देखकर ठिठक गया।
बारिश की पहली तेज़ फुँहारें गिर रही थीं,
और अन्वी भाभी बरामदे में बिना छतरी के खड़ी थीं—
हवा में उड़ते बाल, भीगी पलकें, और मुस्कुराता चेहरा।
उनकी हल्की साड़ी भीगकर बदन से चिपक गई थी,
लेकिन उनकी हंसी…
कोई भी दिल धड़का दे।
“आप भीग क्यों रहीं हैं भाभी?”
रोहन ने हैरानी से पूछा।
अन्वी खिलखिलाईं—
“कई दिनों से बारिश को महसूस नहीं किया था… आज दिल किया, तो सोचा भीग लूँ।”
बरामदे की पीली लाइट में वह बहुत खूबसूरत लग रही थीं।
रोहन अनजाने में ही उन्हें देखता रह गया।
भाग 2 — भाभी की ठंड, और रोहन की बेचैनी
अचानक एक तेज़ हवा चली और भाभी के बाल उनके चेहरे पर चिपक गए।
उन्होंने बाल हटाने के लिए हाथ उठाया,
लेकिन उँगलियाँ काँप रही थीं।
रोहन ने कहा—
“अंदर चलिए भाभी, ठंड लग जाएगी।”
अन्वी धीरे से मुस्कुराईं—
“तुम आओ तो चलूँ…”
उसकी आँखों में नरम चाह थी।
रोहन एक पल के लिए रुक गया।
बारिश, हवा और उसके बीच खड़ी भाभी—
उसकी धड़कनें तेज़ हो रहीं थीं।
वो उनके पास गया और बोला—
“चलो भाभी… आप भी।”
अन्वी ने होंठ काटते हुए कहा—
“पहले पकड़ो मुझे… फिसल न जाऊँ।”
रोहन ने उनका हाथ पकड़ लिया।
उनकी उंगलियाँ ठंडी थीं…
पर स्पर्श में एक अजीब-सी गर्माहट थी।
भाग 3 — तौलिया और पहली नज़दीकी
जैसे ही दोनों अंदर आए,
भाभी के शरीर से पानी की बूंदें फर्श पर गिरने लगीं।
रोहन तुरंत अलमारी से तौलिया ले आया—
“लो भाभी… सूख जाओ।”
अन्वी ने तौलिया लिया, पर हाथ काँप रहे थे।
उन्होंने बाल सुखाने की कोशिश की,
लेकिन उनका हाथ बार-बार फिसल रहा था।
रोहन कुछ देर तक देखता रहा,
फिर बोला—
“मैं मदद कर दूँ?”
अन्वी ने धीरे से आँखें उठाईं—
“कर दोगे?”
वो बोल अलग था…
मीठा, हल्का-सा काँपता हुआ…
जैसे भाभी सिर्फ़ तौलिया नहीं,
अपना अकेलापन भी सौंप रही हों।
रोहन उनके पीछे खड़ा हुआ।
तौलिया से उनके बाल धीरे-धीरे सुखाने लगा।
उनके भीगे बालों की खुशबू…
और गर्म सांसें…
उसके सीने तक उतर रही थीं।
भाभी ने आँखें बंद कर लीं।
धीरे से बोलीं—
“तुम्हारा स्पर्श… बहुत सुकून देता है…”
रोहन के हाथ रुक गए।
भाग 4 — चुंबकीय पल जिसमे दोनों खो गए
भाभी मुड़ीं।
अब वो सीधे रोहन के सामने थीं।
भीगे बाल कंधों पर गिर रहे थे,
और साड़ी से छनकर आती खुशबू ने माहौल को बदल दिया था।
उनकी आँखों में हल्का-सा डर…
लेकिन उससे ज़्यादा चाह थी।
“रोहन…”
उन्होंने फुसफुसाया।
“हाँ भाभी…”
“ये जो तुम्हारी आँखें हैं…
इनसे भाग नहीं पाती मैं।”
रोहन ने उनकी तरफ एक कदम बढ़ाया।
अन्वी पीछे नहीं हटीं—
बल्कि हल्के से उनके करीब आ गईं।
अब दोनों के बीच सिर्फ़ तेज़ सांसों का फासला था।
रोहन ने उनका चेहरा अपने हाथों में लिया।
भाभी ने आँखें बंद कर लीं…
और अगला पल
उनके बीच धड़कनों का…
एक गर्म,
धीमा,
संवेदनशील मिलन था।
रोहन ने उनके गाल पर एक लंबा, नर्म चुंबन दिया।
भाभी की सांसें तेज़ हो गईं।
उनके हाथ रोहन की गर्दन के पीछे तक पहुँच गए।
किचन के पास खड़े दो वयस्क—
बारिश की महक,
कमरे की गर्माहट,
और भीतर की चाहत से घिरे हुए।
उनकी दूरी लगभग मिट चुकी थी।
भाग 5 — बरामदे की ठंडी हवा, और गर्म आलिंगन
अचानक बाहर से हवा ने पर्दे हिलाए।
भाभी ने रोहन को अपनी तरफ खींच लिया—
“आज… मुझे अकेलापन बहुत ज्यादा लगा।”
रोहन ने उन्हें अपनी बाँहों में कसकर भर लिया।
भाभी का शरीर उसके सीने से सटा था—
गर्म, कोमल और चाहत से भरा हुआ।
दोनों बरामदे की तरफ बढ़े।
बारिश अभी भी चल रही थी…
लेकिन अब दोनों अंदर,
एक-दूसरे की गर्माहट में डूबे थे।
भाभी ने कहा—
“रोहन… अगर आज मैं तुम्हारे थोड़ा और करीब आऊँ…
तो क्या तुम बुरा मानोगे?”
रोहन ने धीरे से कहा—
“मैं तुम्हें कभी भी दूर नहीं करूँगा।”
उनकी उंगलियाँ फिर से एक-दूसरे में फँस गईं।
रोहन ने उनका माथा चूमा,
भाभी ने रोहन के सीने पर हाथ रखा…
और दोनों उसी बरामदे में बैठ गए,
जहाँ कुछ देर पहले बारिश ने उन्हें भीगा दिया था।
अब दोनों के दिल…
एक-दूसरे में भीग रहे थे।
भाग 6 — रात का सुकून और एक नई शुरुआत
कुछ देर बाद भाभी ने कहा—
“शायद… यह सब होने वाला ही था।”
रोहन ने पूछा—
“क्यों?”
भाभी ने मुस्कुरा कर कहा—
“क्योंकि तुम्हारी आँखों में…
मैंने पहली बार खुद को सुंदर महसूस किया।”
रोहन ने उनका हाथ चूमा—
“और आपकी मुस्कान में…
मैंने पहली बार चाहत महसूस की।”
भाभी ने आँखें बंद कर लीं।
उनका सिर रोहन के कंधे पर टिक गया।
बारिश रुक चुकी थी।
लेकिन उनके दिलों में…
एक नया मौसम जन्म ले चुका था—
गर्माहट का,
नज़दीकियों का,
और एक अनकहे रिश्ते का।
सभी पात्र 21+ उम्र के वयस्क हैं। कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।