“बारिश की रात… और उसकी अधूरी कहानी”

भाग 1 — शहर की तेज़ बारिश और एक अनजानी मुलाक़ात

अंकित, 26 साल का ग्राफिक डिज़ाइनर, ऑफिस से देर तक काम करके निकल रहा था।
बारिश इतनी तेज़ थी कि सड़कें छोटी नदियों जैसी लग रही थीं।

मुंबई की बारिश अपनी ही एक दुनिया है—
कभी हल्की बूंदें, कभी अचानक तूफ़ान।
उस रात भी ऐसा ही था।

ऑफिस बिल्डिंग के बाहर खड़ी एक लड़की छतरी के नीचे काँप रही थी।
हल्की नीली ड्रेस, खुले बाल, और गालों पर बारिश की बूंदें—
अंकित ने अनजाने में एक पल के लिए उसे देख लिया।

लड़की ने भी उसकी तरफ देखा…
आँखों में हल्की-सी बेबसी थी।

अंकित ने झिझकते हुए पूछा—

“Cab मिल रही है क्या?”

लड़की ने सिर हिलाकर ‘नहीं’ कहा।

“मैं यहीं पास रहती हूँ… लेकिन इस बारिश में पैदल भी नहीं जा सकती…”

अंकित ने अपनी छतरी आगे बढ़ाई—

“अगर आप चाहें… तो मैं छोड़ दूँ। मेरा रास्ता सिर्फ़ दो गली आगे है।”

लड़की ने पहले संकोच किया, फिर धीरे से बोली—

“Thanks… मैं भी यहीं 5 मिनट की दूरी पर रहती हूँ।”

दोनों एक ही छतरी में आ गए।
उनके कंधे टकरा रहे थे, और हवा में उनके शरीरों की गर्मी घुलने लगी थी।


भाग 2 — नामों से शुरू हुई पहचान

बारिश में भरी सड़क पर चलते हुए लड़की ने कहा—

“मैं सान्वी हूँ… HR में काम करती हूँ। और आप?”

“अंकित… डिज़ाइनर हूँ।”

सान्वी थोड़ी मुस्कुराई—
“डिज़ाइनर लोग थोड़े अलग होते हैं… शांत, पर गहराई वाले।”

अंकित हँसा—
“और HR वाली लड़कियाँ?”

सान्वी ने आँखें झुकाईं—
“उन्हें हर कोई judge करता है… पर कोई समझता नहीं।”

दोनों के बीच एक अनकही नरमी बनी हुई थी।

कुछ देर बाद बारिश और तेज़ हो गई।
छतरी छोटी पड़ने लगी।
सान्वी अंकित के और करीब आ गई।

अंकित को उसकी खुशबू तक महसूस हो रही थी—
हल्की, भीगी हुई, दिल में उतर जाने वाली।

सान्वी ने धीरे से कहा—

“तुम्हारी छतरी अच्छी है… पर तुम्हारा साथ और अच्छा।”

अंकित का दिल एक पल को थम-सा गया।


भाग 3 — एक कप कॉफ़ी और बढ़ती बातें

घर पहुँचने के बजाय, सान्वी अचानक रुक गई और बोली—

“उधर एक छोटी-सी कॉफ़ी शॉप है… बंद होने से पहले चलें?”

अंकित कुछ बोल नहीं पाया।
सान्वी पहले ही उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रही थी।

शॉप लगभग खाली थी।
दोनों ने कोने वाली टेबल ले ली।

सान्वी अपनी हाथों से कप को गर्म करते हुए बोली—

“मेरी जिंदगी में सुकून बहुत कम है… और आज जाने क्यों, तुम्हारे साथ वो मिल रहा है।”

अंकित ने ईमानदारी से कहा—

“मैं भी तुमसे मिलकर… हल्का महसूस कर रहा हूँ।”

सान्वी कुछ देर उसे देखती रही…

फिर बोली—
“क्या तुम single हो?”

अंकित ने सिर हिलाया।

सान्वी ने कप नीचे रखा…
उसकी आँखों में एक अजीब चमक थी—

“अच्छा है… शायद हम दोनों कुछ पल बाँट सकते हैं।”


भाग 4 — पहली नज़दीकियाँ, पहली गर्माहट

जब दोनों कॉफ़ी शॉप से निकले, बारिश अब हल्की बूंदों में बदल गई थी।

सान्वी ने खुद ही अंकित का हाथ पकड़ लिया।

उसका हाथ गर्म था…
और उस स्पर्श में एक ऐसा विश्वास था जिसने अंकित को भीतर तक हिला दिया।

कुछ देर बाद दोनों सान्वी के बिल्डिंग के नीचे थे।

सान्वी ने ऊपर देखा, फिर अंकित की ओर—
“बारिश अभी रुकी नहीं… ऊपर आओगे? भीगे हुए हो… ठंड लग जाएगी।”

अंकित ने थोड़ी झिझक के साथ हाँ कहा।

सान्वी का फ्लैट छोटा, साफ-सुथरा और बेहद cozy था।
हल्की रोशनी, लैवेंडर की खुशबू…
और दीवार पर कुछ पेंटिंग्स।

सान्वी ने तौलिया लाकर दिया—
“साफ़ कर लो… नहीं तो बीमार हो जाओगे।”

अंकित बाल सुखा ही रहा था कि सान्वी धीरे से बोली—

“क्या मैं एक बात पूछूँ?”

“हाँ…”

सान्वी करीब आई…
इतनी करीब कि अंकित उसकी सांसें महसूस कर सकता था।

“तुम मुझे अजीब तो नहीं समझ रहे?”

अंकित ने उसके गालों को हल्के से छुआ—
“नहीं… मैं बस तुम्हें समझ रहा हूँ।”

सान्वी की आँखें नम-सी हो गईं।

उसने धीरे से अंकित का हाथ अपने हाथ में लिया—
और उसके सीने पर रख दिया।

सान्वी की गर्माहट…
उसकी नज़दीकी…
उसकी धीमी सांसें…

सब कुछ उस पल को गहराई दे रहा था।


भाग 5 — चाहत की गहराई

अंकित ने उसकी कमर को हल्के से थामा।
सान्वी का शरीर हल्का सा काँपा।

उसने फुसफुसाकर कहा—

“मैं अकेली रहती हूँ… कई रातें बहुत अकेली होती हैं… आज तुम्हारे आने से… जैसे कुछ पूरा हो गया है।”

अंकित ने उसे और करीब कर लिया—

सान्वी ने अपना सिर उसके सीने पर रख दिया…
और कुछ सेकंड यूँ ही खामोशी में घुल गई।

कुछ देर बाद उसने ऊपर देखकर कहा—

“क्या मैं तुम्हें चूम सकती हूँ?”

अंकित कुछ बोल नहीं पाया…
बस उसकी आँखों में देखता रह गया।

सान्वी ने उसके होंठों को सबसे हल्के चुंबन से छुआ।

वो चुंबन इतना नर्म…
इतना धीमा…
जैसे उसने सारी बची हुई उदासी उसी पल बाहर निकाल दी हो।

धीरे-धीरे उनकी सांसें तेज़ होने लगीं।
सान्वी की हथेलियाँ अंकित की पीठ पर घूमने लगीं।
अंकित ने उसके बालों को पीछे किया, उसके कानों के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ीं।

सान्वी की आवाज़ थोड़ी भारी, थोड़ी काँपती हुई—
“अंकित… आज मुझे तुम्हारी जरूरत है… सिर्फ़ company नहीं… पास होने की…”

उस पल अंकित ने उसे इतने कोमल तरीके से अपनी बाहों में लिया कि सान्वी की आँखों में चमक आ गई।

उनके चुंबन गहरे होने लगे।
सान्वी का शरीर उसके करीब खिंचता जा रहा था।
हर स्पर्श में चाहत, गर्मी, और एक अजीब-सी राहत थी।

उसने अर्जुन की शर्ट के बटन खोल दिए…
पर बिना किसी जल्दी के—
धीरे-धीरे…
समझदारी से…
जैसे वो उसके हर अहसास को महसूस करना चाहती हो।

और फिर…
वो दोनों बिस्तर तक चले गये।

वो रात संवेदनशीलता, कोमल चुंबनों, गर्म स्पर्शों और दो वयस्कों के गहरे मिलन से भरी हुई थी।
कोई जल्दबाज़ी नहीं…
कोई गलत चाह नहीं…
बस दो अकेले दिलों का धीमा, नर्म, सहमति भरा प्यार।


भाग 6 — सुबह की हल्की रोशनी

सुबह की धूप सान्वी के चेहरे पर पड़ रही थी।

अंकित ने उसकी आँखें खुलते ही मुस्कुराकर कहा—

“Good morning…”

सान्वी ने उसके हाथ को अपने गाल पर रखा—
“कल की रात… बहुत ज़रूरी थी मेरे लिए।”

अंकित बोला—
“मेरे लिए भी।”

सान्वी बिस्तर में उसकी बाँहों में सिमट गई—
“क्या तुम मुझसे फिर मिलोगे?”

अंकित ने हल्के से उसके माथे को चूमा—

“जब भी तुम चाहो…”

सान्वी ने मुस्कुराकर कहा—

“तो फिर… ये बस शुरुआत है।

(Disclaimer: कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। सभी पात्र 21+ उम्र के हैं। कहानी में कोई explicit sexual detail नहीं है।)

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