भाग 1 — स्टेशन की भीड़ और एक अचानक मुलाक़ात
रोहन रात 9 बजे तक ऑफिस में अटका रहा।
ट्रेन पकड़ने के लिए वो जल्दबाज़ी में स्टेशन पहुँचा।
प्लेटफ़ॉर्म 4 पर पहुँचते ही उसकी नज़र एक परिचित चेहरे पर अटक गई।
वो अन्वी भाभी थीं।
नीली साड़ी, खुले बाल,
हाथ में छोटा-सा बैग…
और भीड़ में खोई हुई सी।
रोहन हैरान हुआ—
“भाभी? आप यहाँ?”
अन्वी ने पलटकर देखा…
पहले आश्चर्य, फिर एक प्यारी-सी मुस्कान।
“अरे रोहन… तुम भी इसी ट्रेन से?”
रोहन ने हँसते हुए कहा—
“हाँ भाभी… लगता है आज सफ़र साथ होगा।”
उनकी आँखों में हल्की-सी खुशी थी,
जैसे उन्हें किसी अपने का सहारा मिल गया हो।
भाग 2 — ट्रेन के डिब्बे में अकेला सफ़र
ट्रेन चली।
उनके पास की बर्थें खाली थीं।
डिब्बा आधा खाली था,
हल्की पीली लाइट,
और बाहर अँधेरी रात।
अन्वी ने खिड़की की तरफ बैठते हुए कहा—
“अकेले ट्रैवल करते हुए डर लगता है… खासकर रात में।”
रोहन ने उसकी ओर देखा—
“अब मैं हूँ न… पूरा सफ़र पास बैठूँगा।”
भाभी ने हल्का-सा सिर झुकाया…
उनकी आँखों में एक अजीब-सी नरमी थी।
ट्रेन की लाइट में
उनकी साड़ी की हल्की चमक…
और कंधे पर गिरते भीगे बाल…
रोहन का दिल तेज़ करने लगे।
भाभी ने पर्स से पानी निकालते हुए पूछा—
“तुम कुछ खाओगे?”
“बस आपको देख… प्यास कम हो गई।”
भाभी हँस पड़ीं—
एक हल्की, शर्मीली हंसी जिसमें मिठास थी।
भाग 3 — सीट साझा करते हुए पहली नज़दीकियाँ
कोच थोड़ा झटका खाता था,
और हर झटके के साथ
भाभी की बाजू रोहन से टकरा जाती।
पहले वो थोड़ा हटतीं—
फिर रुक गईं।
जैसे उन्हें वो स्पर्श अच्छा लग रहा हो।
रोहन ने पूछा—
“ठंड लग रही है क्या?”
भाभी ने कहा—
“हाँ… थोड़ी।”
रोहन ने जैकेट उतारकर उनके कंधों पर डाल दी।
भाभी का शरीर एक पल को स्थिर हो गया…
उनकी सांसें हल्की-सी तेज़ हुईं।
“रोहन… तुम हमेशा इतना ख्याल क्यों रखते हो मेरा?”
रोहन धीरे बोला—
“क्योंकि… आप उसकी हक़दार हो।”
भाभी ने आंखें झुका लीं।
ट्रेन की खिड़की से आती हवा में
उनके बाल उड़ रहे थे…
रोहन ने धीरे से बाल पीछे किए।
भाभी ने नज़रों से रोका नहीं—
बल्कि उन्हें उसी कोमल स्पर्श में रहने दिया।
भाग 4 — ट्रेन का अँधेरा, दो दिलों की रोशनी
कुछ देर बाद ट्रेन सुरंग में गई।
डिब्बा पूरी तरह अँधेरा हुआ।
भाभी अचानक घबरा गईं और रोहन का हाथ पकड़ लिया।
“रोहन… डर लग रहा है…”
रोहन ने उनका हाथ कसकर पकड़ा—
“मैं हूँ न… आप अकेली नहीं।”
सुरंग लंबी थी।
अँधेरे में भाभी की उंगलियाँ
रोहन की उंगलियों में और कसकर फँस गईं।
उनकी सांसें रोहन के कंधे पर महसूस हो रहीं थीं।
रोशनी वापस आई—
लेकिन भाभी ने हाथ नहीं छोड़ा।
उनकी उंगलियों की गर्मी
अब चाहत में बदल रही थी।
भाग 5 — ऊपरी बर्थ पर बैठा एक दिल, नीचे बैठा दूसरा
भाभी ऊपरी बर्थ पर चढ़ नहीं पा रहीं थीं।
ट्रेन हिल रही थी।
उनकी साड़ी बार-बार फँस रही थी।
रोहन आगे आया—
“भाभी… पकड़िए मेरा हाथ।”
भाभी ने हाथ पकड़ लिया…
रोहन ने उन्हें ऊपर खींचा।
उनकी कमर…
रोहन के कंधे से छू गई।
भाभी के शरीर में हल्की-सी कंपकंपी दौड़ गई।
वो ऊपर गईं,
फिर रोहन की तरफ देखती रहीं।
आँखों में एक अजीब-सी चमक थी।
“तुम भी ऊपर आ जाओ?”
उन्होंने धीरे से कहा।
रोहन चौंका—
आواز में नर्माहट थी, जरूरत थी, और…
हल्की-सी छिपी चाह भी।
वो ऊपर चढ़ गया।
बर्थ छोटी थी।
उनके बीच कुछ इंच का ही अंतर…
सांसें मिल रहीं थीं।
भाभी ने धीमे से कहा—
“रोहन… तुमसे न जाने क्यों…
सुरक्षित feel करती हूँ।”
रोहन ने कहा—
“और मैं… आपके करीब।”
भाभी की आँखें चमक उठीं।
भाग 6 — हल्का झटका… और गहरा आलिंगन
ट्रेन अचानक तेज़ झटके से रुकी।
भाभी सीधे रोहन के ऊपर गिर गईं।
उनके बाल रोहन के चेहरे पर…
उनकी हथेलियाँ रोहन की छाती पर…
भाभी ने आँखें खोलकर उसे देखा—
बहुत पास से।
इतना पास कि रोहन को उनकी सांसें
अपने होंठों पर महसूस हो रही थीं।
भाभी फुसफुसाईं—
“अगर मैं… ऐसे ही रुक जाऊँ तो?”
रोहन ने धीरे से उनका चेहरा पकड़ा—
“तो पूरी रात… आपके साथ जागूँगा।”
भाभी ने आँखें बंद कर लीं।
उनके माथे पर रोहन का हल्का चुंबन—
धीमा,
गर्म,
गहरा।
भाभी की उंगलियाँ
रोहन की गर्दन पर टिक गईं।
बर्थ छोटी थी,
लेकिन उस छोटी जगह में
दो दिलों की दूरी पूरी तरह मिट चुकी थी।
भाग 7 — सुबह की रोशनी और एक नया रिश्ता
सुबह 5 बजे ट्रेन प्लेटफॉर्म पर पहुँची।
भाभी अभी भी रोहन के कंधे पर सिर रखे थीं।
सुबह की हल्की धूप में
उनके चेहरे का सुकून कुछ और ही था।
रोहन ने धीरे से उन्हें जगाया—
“स्टेशन आ गया भाभी…”
अन्वी मुस्कुराकर बोलीं—
“इतनी आराम से… बहुत समय बाद सोई हूँ।”
रोहन ने कहा—
“मेरे साथ… फिर कभी सफ़र करोगी?”
भाभी ने गहरी सांस लेकर कहा—
“सफ़र? रोहन…
अब तो शायद रिश्ता भी…”
रोहन ने उनका हाथ पकड़ा।
भाभी ने हाथ छोड़ा नहीं—
बल्कि और कसकर पकड़ लिया।
प्लेटफ़ॉर्म की भीड़ में
दोनों साथ निकले—
ट्रेन की रात
अब दो दिलों की सुबह बन चुकी थी।
सभी पात्र 21+ उम्र के वयस्क हैं। कहानी पूर्णतः काल्पनिक है।