भाग 1 – सुबह की हल्की रोशनी और भाभी की मुस्कान
सुबह के 8 बज रहे थे।
रोहन, 24 साल का, रात देर तक पढ़ाई करके उठा था।
घर में हल्की-सी भाग-दौड़ थी।
रसोई से चम्मचों की आवाज़ और गैस पर चाय की खुशबू फैल रही थी।
किचन में भाभी, यानी अन्वी, खड़ी थीं।
हल्की गुलाबी सूट, बाल क्लिप में बंधे हुए, आँखों में एक ईमानदार चमक।
रोहन ने उनींदी आँखों से कहा—
“Good morning भाभी…”
अन्वी मुस्कुराईं—
“शुभ सुबह नहीं, देर सुबह कहो!”
उनकी चुटकी में एक नरम अपनापन था,
कुछ ऐसा… जो रोहन को हमेशा से थोड़ा अलग महसूस कराता था।
रसोई में आती गर्म भाप, बर्तन की हल्की आवाज़ें और भाभी की मुस्कान—
इन तीनों का मिलकर एक अजीब-सा माहौल बन जाता था।
भाग 2 – किचन में पहली बार बढ़ती नज़दीकी
भाभी पराठे बना रहीं थीं।
रोहन ने पास आकर पूछा—
“भाभी, मदद कर दूँ?”
अन्वी ने हल्के से आँखें उठाईं—
“तुम? मदद? तुम तो पानी भी गिलास में नहीं भरते।”
रोहन हँस पड़ा—
“आज कर दूँगा, कसम से।”
भाभी ने बेलन रोककर उसे देखा—
“अच्छा… तो आटा उठा दो।”
रोहन पास आया।
आटा उठाते हुए उसकी उंगलियाँ भाभी के हाथ से हल्के से छू गईं।
स्पर्श बहुत हल्का था… लेकिन
दोनों के दिल में एक छोटी-सी लहर उठी।
भाभी ने तुरंत हाथ नहीं हटाया।
कुछ पल दोनों की उंगलियाँ साथ ही रहीं—
फिर भाभी ने थोड़ा झेंपकर कहा—
“सावधान रहो…”
लेकिन आवाज़ में झुंझलाहट कम,
और एक अलग तरह की नरमी ज़्यादा थी।
भाग 3 – किचन की गर्माहट में उठती धीमी चाहत
स्टोव की आग, तवा, पराठों की महक…
और उसके बीच रोहन और भाभी।
रोहन सिंक के पास खड़ा बर्तन धोने लगा।
भाभी उसके पीछे पराठा सेंकते हुए बोलीं—
“तुमने अचानक इतना काम कैसे शुरू कर दिया?”
रोहन ने मुस्कुराकर कहा—
“आपके लिए…”
भाभी थोड़ा रुकीं।
उनका हाथ हवा में ही रोक गया।
धीरे से बोलीं—
“मजाक मत करो रोहन…”
रोहन उनके पास आकर बोला—
“अगर सच हो तो?”
भाभी का चेहरा हल्का-सा लाल हो गया।
कमरे में सिर्फ़ गैस की धीमी आवाज़ थी…
और दिल की तेज धड़कनें।
भाग 4 – वो पल जब आँखें बोलने लगीं
आटे से धुला हुआ एक बर्तन भाभी के हाथ से फिसल गया।
वो नीचे झुकीं।
उसी समय रोहन भी झुका।
दोनों के चेहरों में कुछ इंच का अंतर रह गया।
भाभी का चेहरा उसके बेहद करीब था—
उनकी साँसें रोहन के गाल पर पड़ रही थीं।
एक पल… बस एक लंबा पल…
भाभी ने धीरे से कहा—
“रोहन…”
आवाज़ काँप रही थी।
रोहन ने फुसफुसाकर कहा—
“हाँ भाभी…?”
भाभी ने आँखें बंद कर लीं—
जैसे खुद से लड़ रही हों।
थोड़ी देर बाद उठकर बोलीं—
“तुम्हें… चाय चाहिए?”
ये सवाल चाय का नहीं था—
ये उनके दिल में उठती हलचल को छुपाने की कोशिश थी।
लेकिन रोहन समझ चुका था।
भाग 5 – किचन में फंसी हवा… और गहरी नज़दीकियाँ
भाभी चाय बना रही थीं।
रोहन उनका दुपट्टा ठीक करते हुए बोला—
“एक तरफ गिर रहा है…”
उसने धीरे से दुपट्टा कंधे पर रखा।
स्पर्श बेहद धीमा… बेहद संवेदनशील था।
भाभी की सांसें रुक सी गईं।
उन्होंने रोहन की ओर देखा—
आँखों में कोई झड़प नहीं थी,
बस एक अनकही चाह थी।
रोहन उनके और पास आया।
इतना पास कि
दोनों की सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।
भाभी ने धीमे से कहा—
“रोहन… ये ठीक नहीं है…”
रोहन ने फुसफुसाया—
“जो गलत नहीं लगता… वो गलत कैसे हो सकता है?”
भाभी की आँखों में हल्की नमी थी—
चाहत दबाने की कोशिश…
पर चाहत और दबे कहाँ रहती है।
भाभी ने कहा—
“कोई देख लेगा…”
रोहन ने उनका हाथ पकड़ लिया—
“किचन का दरवाज़ा बंद है भाभी।”
भाभी ने हाथ नहीं छोड़ा…
बल्कि उंगलियाँ उसके हाथ में ज़्यादा कसकर फंसा दीं।
भाग 6 – सिर्फ़ एक आलिंगन… पर दिल तक उतर गया
रोहन ने भाभी को हल्के से गले लगाया।
किचन में खड़े दो वयस्क—
क़रीबी, गर्माहट और चाहत से भरे हुए।
भाभी का सिर रोहन के सीने पर आ गया।
उसकी उंगलियाँ रोहन की पीठ पर सिमट गईं।
उनके बीच कोई जल्दबाज़ी नहीं थी।
सिर्फ़ एक गहरा,
गर्म,
और सुकून भरा आलिंगन।
भाभी ने धीमे से कहा—
“मुझे नहीं पता… ये क्या है…”
रोहन ने उनके बाल सहलाते हुए कहा—
“ये वही है जो आप भी महसूस कर रही हैं… और मैं भी।”
भाभी ने चेहरे को ऊपर उठाया—
उनकी आँखों में चमक थी।
होंठ थोड़ा खुले हुए…
रोहन उनके बहुत करीब झुका—
इतना कि बस कुछ मिलीमीटर का अंतर था।
भाभी ने फुसफुसाया—
“रोहन… प्लीज़…”
लेकिन आवाज़ ‘रुकने’ जैसी नहीं थी…
बल्कि ‘ठहरने’ जैसी थी।
रोहन ने उनके माथे को चूमा—
धीमा, लंबा,
और बेहद संवेदनशील।
भाभी की आँखें बंद हो गईं।
भाग 7 – सच का एहसास… और एक नई शुरुआत
किचन की दीवार पर घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
भाभी ने रोहन के हाथों को अपनी उंगलियों में लिया—
“ये रिश्ता… बहुत नाज़ुक है रोहन…”
रोहन ने कहा—
“पर ख़त्म तो नहीं है।”
भाभी मुस्कुराईं—
शरम, डर और चाहत — सब एक साथ।
“नहीं… खत्म नहीं।
बस… धीरे-धीरे समझेंगे इसको।”
रोहन ने सिर हिलाया।
किचन फिर से सामान्य दिख रहा था,
लेकिन दोनों के दिलों में
एक नया, गर्म और खूबसूरत रिश्ता जन्म ले चुका था।
Disclaimer: यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। सभी पात्र 21+ उम्र के वयस्क हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति से कोई संबंध नहीं